प्राइम टाइम

प्राइम टाइम - आरबीआई और केंद्र सरकार की लड़ाई, देश को नुकसान पहुंचा सकती है?

Posted by Divyansh Joshi on



केंद्र सरकार और आरबीआई के बीच घमासान खुलकर सामने आ चुका है. पहले भी सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच तनातनी होती रही है, लेकिन बयानबाज़ी इतनी खुलकर सामने नहीं आती थी. 26 अक्टूबर 2018 को आरबीआईके डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के भाषण के बाद यह तनाव सतह पर आया. उन्होंने कहा था कि केंद्रीय बैंक टेस्ट मैच खेल रहा है और सरकार टी-20. जानकारों के मुताबिक यह एक तरह से सरकार को आरबीआई जैसे संस्थान में दखल न देने की चेतावनी थी. विरल आचार्य ने यह भी कहा कि केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता में दखल के परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं. स्वायत्त संस्थाओं की बात पर उन्होंने कहा, ‘किसी भी सरकार या संस्था से ज्यादा देश महत्वपूर्ण है.’ अब खबर आ रही है कि उर्जित पटेल ने 19 नवबंर को बैंक के बोर्ड की बैठक बुलाई है.
फिलहाल सरकार के रुख को देखते हुए लगता है कि आरबीआई में नीतिगत दखल के लिए नियम-कानून के पन्ने भी पलटे जा रहे हैं. तनाव इस कदर बढ़ चुका है कि कुछ जानकर मान रहे हैं कि हो सकता है कि आरबीआई के मौजूदा गवर्नर उर्जित पटेल अपना कार्यकाल भी न पूरा कर पाएं. एक समय मोदी सरकार के पसंदीदा बताये जा रहे उर्जित पटेल के इस्तीफे की भी चर्चा चल रही है. आखिर सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच एकाएक तनाव इस कदर क्यों बढ़ गया है?

रिज़र्व बैंक अपने आप में एक स्वायत्त संस्था है. यानी यह सरकार से अलग फैसले लेने के लिए आजाद है. लेकिन कुछ विशेष हालात में इसे सरकार के निर्देश सुनने पड़ते हैं. आरबीआई एक्ट का सेक्शन-7 सरकार को रिज़र्व बैंक को निर्देश जारी करने का अधिकार देता है. इसके मुताबिक केंद्र सरकार जनहित को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय बैंक को निर्देश जारी कर सकती है. जानकारों के मुताबिक सेक्शन-7 लागू होने के बाद रिजर्व बैंक के कारोबार से जुड़े फ़ैसले गवर्नर के बजाय रिज़र्व बैंक का निदेशक मंडल यानी ‘बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स’ लेगा. बैंकिंग व्यवस्था में सुधार के तहत आरबीआई ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कर्ज देने पर खासी सख्ती कर दी है. 11 सार्वजनिक और एक प्राइवेट बैंक को कर्ज बांटने में कड़ाई बरतने के निर्देश दिए गए हैं. इसकी मतलब यह है कि चुनावी साल में सरकार यह नहीं चाहती कि लोगों को कर्ज मिलने में इतनी परेशानी हो. सरकार चाहती है कि छोटे और मंझोले उद्योग को आसानी से कर्ज दिए जाएं.

सरकार के साथ आरबीआई की खींचतान की एक और वजह यह है कि वह केंद्रीय बैंक के लाभांश में और ज्यादा हिस्सेदारी चाहती है. सरकार आरबीआई से काफी समय से यह मांग कर रही है कि लाभांश के तौर पर उसे ज्यादा रकम उपलब्ध कराने के लिए नियमों में बदलाव किया जाए.चुनावी साल होने के चलते केंद्रीय बैंक पर यह दबाव और बढ़ रहा है क्योंकि बजट के तमाम वादों को पूरा करने के लिए सरकार को ज्यादा पैसों की जरूरत होगी. लेकिन आरबीआई का मानना है कि मौजूदा आर्थिक हालात को देखते हुए अपनी बैलेंस शीट मजबूत रखना ज्यादा जरूरी है.
केंद्रीय बैंक और केंद्र सरकार के बीच बढ़ते टकराव के बीच आरबीआई एक्ट के सेक्शन-7 की चर्चा भी गर्म है. बताया जा रहा है कि सरकार अब यह प्रावधान लागू करने की सोच रही है. अगर ऐसा हुआ तो केंद्रीय बैंक के करीब 83 साल के इतिहास में यह पहली बार होगा.