प्राइम टाइम

प्राइम टाइम - ईएमएसटीवी का चुनाव एनालिसिस

Posted by Divyansh Joshi on



मध्य प्रदेश में 28 नवम्बर को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है। पिछले चुनाव की तरह इस बार भी मुख्य मुक़ाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच है। भाजपा लगातार तीन बार से विधानसभा चुनाव जीत रही है, तो कांग्रेस को पिछले 15 सालों से करारी हार का सामना करना पड़ रहा है। शिवराज सिंह चौहान तेरह सालों से सत्ता की कमान संभाले हुए हैं।पिछले पांच विधानसभा चुनावों का लेखा जोखा देखें तो आठ से दस प्रतिशत के अंतर से दोनों पार्टियां सत्ता पर काबिज होतीं आ रही हैं। पिछले दो चुनावों में अधिक वोटिंग होने के कारण दोनों ही पार्टियों का वोट बैंक बढ़े है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि भाजपा और कांग्रेस में वोटों की संख्या के लिहाज से जीत का ज्यादा अंतर नहीं रहा। कांग्रेस को उम्मीद है कि उसका वनवास ख़त्म होगा वैसे पिछले दो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का वोट प्रतिशत भी बढ़ा है। 1998 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने वोट प्रतिशत में महज दो फीसदी के अंतर से सरकार बनाई थी। इस बार 2003 के चुनाव जैसा माहौल है । 2003 में विधानसभा चुनाव के दौरान मध्य प्रदेश राज्य का विभाजन हो गया था और छत्तीसगढ़ नया राज्य बन गया था। मध्य प्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सीटें थीं। जब 2003 में हुए चुनावों में भाजपा ने 42.50 फीसदी वोट हासिल करके 173 सीटें जीती और सरकार बनाई थी। जबकि कांग्रेस को 31.59 फीसदी वोट मिले थे और कांग्रेस 38 सीटों पर सिमट गई थी। उस वक्त दिग्विजय विरोध की लहर का फायदा भाजपा को आश्चर्यजनक रूप से मिला था। इस बार के चुनाव में कुछ कुछ ऐसा ही माहौल बना हुआ है ये शिवराज विरोधी न होकर केंद्र के कड़े फैसलों के खिलाफ है ऐसे में जनता का गुस्सा भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है, भाजपा को पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार घर के विभीषणों से ज्यादा नुकसान होने की आशंका है। 2013 के आंकडे़ की बात करें तो 2013 में यहां बहुजन समाज पार्टी उभर कर सामने आई और 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा को कुल 21 लाख 28 हजार 333 वोट मिले थे। इस बार भी बसपा को इस विधानसभा चुनाव में भी 6-7 प्रतिशत वोट और 3-5 सीटें मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है। चुनाव में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच में ही रहने की उम्मीद है। लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि इस बार यह मुकाबला बहुत करीबी हो सकता है। जानकारों का कहना है कि बसपा का प्रदर्शन ठीक रहा तो कांग्रेस को फायदा होगा। कांग्रेस का मानना है कि विधानसभा चुनाव 2013 में उसे भले ही 58 सीटें मिली हो, लेकिन वह 36.38 फीसदी वोट पाने में भी कामयाब रही थी। बीजेपी और कांग्रेस के बीच जीत और हार का अंतर 8.42 फीसदी मतों का था. ऐसे में यदि, बीएसपी सीधे तौर पर करीब 6 फीसदी वोट हासिल कर लेती है तो जीत का अंतर करीब 2 फीसदी का बच जाएगा. क्योंकि बीते 15 सालों से मध्‍य प्रदेश में बीजेपी की सरकार है और विभिन्‍न मुद्दो पर लोग बीजेपी से नाराज है, लिहाजा, दो फीसदी वोट बेहद आसानी से हासिल कर मध्‍य प्रदेश विधानसभा चुनाव में आसानी से जीत हासिल की जा सकती है। इन सब के बीच इस बार के चुनाव में एक कड़ी निकल कर सामने आती है वह यह प्रदेश के युवा । 2013 विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रति युवाओं का रुझान ज्यादा था। केन्द्र की यूपीए सरकार आरोपों में घिरी थी। इसलिए उसे वोट अधिक मिले। इसके अलावा कुल मतदान का प्रतिशत भी अधिक था। इस बार भी कहा जा रहा है कि युवाओं का रुझान जिस पार्टी की ओर होगा, जीत का सेहरा भी उसी दल के नेता के सिर बंधेगा। प्रदेश में 70-80 लाख युवा ऐसे हैं जो पहली बार अपने क्षेत्र के विधायक को चुनने के लिए मताधिकार का प्रयोग करेंगे। चुनाव आयोग के आंकड़े के अनुसार मध्यप्रदेश में करीब 1 करोड़, 37 लाख, 83 हजार 383 ऐसे युवा मतदाता हैं जिनकी आयु 18 से 29 साल के बीच की है। राज्य में युवाओ का भाजपा के प्रति रुझान कम हुआ है।अभी तक के सर्वेक्षण में भाजपा को किसानों, युवा, बेरोजगार, पेट्रोल डीजल और गैस की बढ़ती कीमतों से महिलाओं का समर्थन भी 12 फीसदी कम हुआ है। ऐसी स्थिति में इसका फायदा सीधी कांग्रेस को मिल रहा है। बसपा गोगापा एवं अन्य राजनैतिक दलों के पक्ष में कोई समर्थन देखने को नहीं मिला है। इस बार भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है। भाजपा का वोट फीसदी इस बार 36 फीसदी से ज्यादा नहीं होगा। वहीं कांग्रेस को 44.25 फीसदी के पास रहने का अनुमान है। इस बार नोटा में 4 फीसदी से ज्यादा वोट नोटा में डलने जा रहे है। जो सारे देश में नोटा का एक रिकार्ड बनाने जा रहे है।