प्राइम टाइम

प्राइम टाइम - किसानो के मार्च से आखिर किसे हुआ फायदा ?

Posted by Divyansh Joshi on



देश का अन्नदाता एक बार फिर अपनी मांगों को लेकर शुक्रवार को दिल्ली की सड़कों पर उतरा. इस उम्मीद से कि सरकार उसकी सुनेगी. देशभर के लगभग 25 राज्यों से दिल्ली के रामलीला मैदान में 29 नवंबर को इकट्ठा हुए हजारों किसानों ने संसद भवन तक मार्च किया। लगभग 200 किसान संगठनों के आह्वान पर किसान मुक्ति मार्च जब सड़क पर निकला तो किसी के हाथों में झंडे थे, तो किसी के हाथों में तख्तियां. किसी के गले में नरमुंड की माला थी तो किसी में आलू की. लेकिन लगभग 10 से 12 हजार की । कुछ बेहद छोटे-छोटे संगठन, कुछ बहुत बड़े. किसान नेता स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने की मांग कर रहे हैं. सरकार से कह रहे हैं कि 21 दिनों का विशेष संसद सत्र बुलाओ. जिसमें सिर्फ किसानों से जुड़े मुद्दों पर बात हो. 29 नवंबर को दिल्ली के ही रामलीला मैदान में जमा हुए सब लोग. अलग-अलग रंगों के झंडों के नीचे. अलग-अलग पार्टियों के. कुछ बिना पार्टी वाले भी. अलग-अलग राज्यों के. अलग-अलग जातियों के. अलग-अलग विचारधाराओं के. कोई खेतिहार मजदूर है. आपको पीली टोपियों वाले सिर भी दिखते हैं और सफेद मुसलमानी टोपी वाले सिर भी. सौ तरह के अलग-अलग नारे. किसी की शिकायत ये कि सरकार जबरन उनकी जमीन ले रही है. बिना सही मुआवजा दिए.। इस दौरान इस आंदोलन से जुड़ा एक पीला पर्चा खूब वायरल हुआ। . जिसमें एक टेबल के माध्यम से ये बताया गया है कि सब्जी और अन्य फसलों के बाजार मूल्य और किसानों को मिलने वाले दामों में कितना अंतर है. साथ ही इस पर्चे में लिखा है कि इस आंदोलन का उद्देश्य किसी को परेशान करना नहीं है, बल्कि हम (यानी किसान) क्या किसी को परेशान करेंगे हम तो खुद ही काफी परेशान हैं। इस पर्चे के साथ किसानो का यह कहना किसी के भी आंखों में आंसू ला देता है । किसान दिल्ली भी आ गए, मार्च भी हो गया और वापस भी चले गए लेकिन इन सब के बीच क्या हुआ किसे फायदा हुआ । इन मार्च में किसी को फायदा हुआ तो वह राजनीतिक दलों को , जी हां इस आंदोलन में शामिल हुए राजनीतिक दलों ने हर बार की तरह इस बार भी किसान आंदोलन को राजनीतिक पहलू में ठाल लिया । सीताराम येचुरी, डी. राजा, शरद यादव, शरद पवार के साथ ही राहुलगांधी और अरविंद केजरीवाल का इस आंदोलन में शामिल होना तो यही कहता है । जाहिर है कि राहुल और केजरीवाल के आने की ख़बर ने इन सबको पीछे धकेल दिया. पर उनके आ जाने से किसानों का सवाल कितना आगे बढा? यह सवाल महत्वपूर्ण है.। स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव, जो आयोजकों में प्रमुख थे, का मानना है कि इससे कुछ हासिल नहीं हुआ और न इन नेताओं का नजरिया बदलने वाला है.लेकिन कल को जब ये सत्ता में आएंगे तो हमारे हाथ में इनसे लड़ने के लिए एक अतिरिक्त हथियार जरूर होगा.योगेंद्र मानें, न मानें पर इन नेताओं के जमावड़े ने ही इस बार के किसान रैली को चर्चा में ला दिया. वहीं किसानों का गुस्सा अव्यवस्थित ढंग से भी फूट रहा है. जगह-जगह दूध-सब्जी-अनाज फेंकना, हंगामा करना आम है, क्योंकि किसान ज्यादा पैदावार से भी परेशान हैं, उसका लागत खर्च भी वापस नहीं आ रहा है. खेती अलाभकर बन गई है. मंदसौर जैसे कई स्थानों पर तो किसानों पर गोलियाँ चली हैं. कर्ज से किसान आत्महत्या कर रहे हैं, क़ीमत मांगते हुए मर रहे हैं.। किसान सचमुच इतना परेशान हैं कि कई लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली है.।दूसरी ओर यह भी हो रहा है कि सबसे बड़े जमात की इस हालत के बावजूद पार्टियाँ और नेता दोबारा चुनाव जीत कर आ रहे हैं. अर्थात किसान अपनी दुर्गति भूलकर नेताओं के कहे से जाति-धर्म के आधार पर वोट दे रहे हैं.।इस बार कुछ स्थिति बदलती लग रही है. भारी लोकप्रियता से सत्ता में आई नरेंद्र मोदी की सरकार भी किसानों और बेकार नौजवानों से डर रही है. हर कहीं से यही रिपोर्ट है।शायद यही कारण है कि 200 संगठनों की भागीदारी के बावजूद कुछ हजार ही किसान जमा हुए पर सारे विपक्षी नेता लाइन लगाकर हाजिर हो गए।