प्राइम टाइम

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Posted by khalid on



पर्यावरण को होने वाले नुकसानों के मद्देनजर प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल पर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। केंद्र और राज्यों की सरकारों की ओर से अक्सर इस मसले पर ठोस पहलकदमी का आश्वासन दिया जाता है, निर्देश जारी किए जाते हैं, लेकिन अपने आसपास देखने के बाद यह समझना मुश्किल नहीं रह जाता है कि प्लास्टिक पर रोक को लेकर हम कितने गंभीर हैं! हालत यह है कि न केवल बाजार से किसी तरह की खरीदारी के क्रम में इससे बचना जरूरी नहीं समझा जाता, बल्कि अब सड़क पर दिखने वाले ज्यादातर प्रचार के बैनर-पोस्टरों में भी कागज का इस्तेमाल घटा है और इसकी जगह प्लास्टिक ने ले ली है।किसी भी चुनाव के मौके पर चारों तरफ प्लास्टिक के पोस्टर-बैनर से होर्डिंग या दीवारें पटी रहती हैं।शायद इसी से चिंतित होकर आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने चुनाव आयोग, पर्यावरण एवं वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को एक बैठक करके यह विचार करने को कहा है कि क्या चुनावों के दौरान प्लास्टिक से बनी प्रचार सामग्री के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई जा सकती है!अधिकरण ने एक याचिका पर निर्देश के तहत संबंधित महकमों से चुनाव विज्ञापनों के लिए किसी भी तरह के बैनर-होर्डिंग में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के लिए जरूरी कार्रवाई करने की मांग की है। हालांकि चुनावों के दौरान विज्ञापन या प्रचार के लिए प्लास्टिक से तैयार सामग्री के बेलगाम इस्तेमाल को लेकर इस तरह की चिंता कोई पहली बार सामने नहीं आई है। पिछले दस सालों में इस तरह की कोशिशें कई बार हुईं। लेकिन इसे कोई समस्या मान कर इसके समाधान का रास्ता निकालना शायद सरकार की प्राथमिकता में शामिल नहीं है।प्लास्टिक से पर्यावरण को होने वाले नुकसानों के तथ्य छिपे नहीं हैं। इसके खतरों के मद्देनजर सरकारें इस पर रोक लगाने की जुबानी घोषणा अक्सर करती दिखती हैं। लेकिन अब तक इस पर पूरी तरह रोक लगाने को लेकर सख्ती बरतने के लिए कोई भी सरकार वास्तव में गंभीर नहीं दिखी है। आम स्थिति यही है कि न तो सरकारें और संबंधित महकमे इस दिशा में कोई स्पष्ट रुख अपना रहे हैं, न आम लोगों के बीच इस स्तर की जागरूकता दिखती है कि वे प्रदूषण फैलाने वाले प्लास्टिक के उपयोग से बचें।