व्यक्तित्व

सुरभि गौतम- म.प्र. के छोटे से गांव से निकलकर बनी आईएएस

Posted by khalid on



किसी ने सही ही कहा, पूत के पैर पालने में ही दिख जाते हैं। ऐसा ही कुछ हाल सतना के अमदरा गांव की बेटी सुरभि गौतम का भी है। सुरभि के पिता मैहर सिविल कोर्ट में वकील हैं और मां डॉ. सुशीला गौतम अमदरा हायर सैकेंड्री स्कूल में शिक्षिका हैं। सुरभि बचपन से ही पढ़ने में मेधावी रही हैं। हाईस्कूल में सुरभि को 93.4 प्रतिशत अंक मिले थे। यही वो नंबर थे, जिन्होंने सुरभि के सपनों और सफलता की नींव रखी। इन्हीं नंबरों के बाद से सुरभि ने कलेक्टर बनने का सपना देखना शुरू कर दिया था। इनकी सफलता ने उन सभी एशो आरामों को खारिज किया है, जिनकी मदद से बड़े-बड़े पद हासिल किये जाते हैं। सुरभि एक छोटे से गांव अमदरा की रहने वाली हैं। अमदरा से ही उन्होंने अपनी बारहवीं तक की पढ़ाई की। 12वीं तक वो एक ऐसे स्कूल में पढ़ीं, जिस स्कूल में मूलभूत जरूरतों का गहरा अभाव था। वहां न तो अच्छे टीचर थे और न ही पढ़ाई लिखाई की अच्छी व्यवस्था। किताबें समय पर नहीं मिलती थीं। सुरभि के गांव में बिजली पानी की अच्छी व्यवस्था नहीं थी। बचपन के दिनों में सुरभि को लाटेन जला कर रात में पढ़ाई करनी पड़ती थी। राष्ट्रपति भवन में सोमवार को 2017 बैच के IAS अधिकारियों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ अपने ट्रेनिंग के अनुभव साझा किये। इस दौरान मध्यप्रदेश के सतना जिले के अमदरा गांव के शासकीय विद्यालय से पढ़कर आईएएस बनीं सुरभि गौतम ने भी राष्ट्रपति के साथ अपने बेहतरीन अनुभव को शेयर किया। आईएएस में सफलता हासिल करने वाली सुरभि के लिए एक वक्त ऐसा भी था जब हिंदी मीडियम में पढ़ाई करने की वजह से उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा था। दरअसल 12वीं की शिक्षा हासिल करने के बाद वो शहर आईं तो कॉलेज में हर कोई अंग्रेजी में बात करता था। अंग्रेजी नहीं बोल पाने की वजह से क्लास में कई बार उनका मजाक बनाया गया। सभी सब्जेक्ट में टॉप करने वाली सुरभि के लिए अंग्रेजी एक मात्र मुश्किल सब्जेक्ट था ऐसे में उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से साबित किया कि भाषा से नहीं मेहनत से सफलता हासिल की जाती है। सुरभि के लिए अंग्रेजी भाषा सबसे बड़ी समस्या थी। उन्होने वो सब कर दिखाया जो अंग्रेजी से पढ़ने वाले भी करते हैं। सुरभि का कहना है कि ज़िंदगी में कुछ भी बेहतर करने के लिए कभी भाषा रुकावट नहीं बनती, वो तो हमारे समाज ने खुद को भाषाओं की बेड़ियों में बांध रखा है। ये वहीं बेड़ियां हैं, जो कभी-कभी देश को दो हिस्सों में बांटती हैं, एक हिस्सा अंग्रेजी और दूसरा हिस्सा हिंदी।