व्यक्तित्व

जन्मदिन विशेष

Posted by Divyansh Joshi on



राजस्थान के बाड़मेर जिले के एक छोटे से गांव – जसोल - में जन्मे जसवंत सिंह का आज जन्मदिन है. वे एक ऐसे नेता थे जो अपने राजनैतिक करियर की शुरूआत से लेकर कोमा में चले जाने तक लगातार सक्रिय रहे. एनडीए सरकार में वित्त, विदेश और रक्षामंत्री रह चुके जसवंत सिंह ने ‘दिल्ली से कई मायनों में बहुत दूर बसे’ देश की पश्चिमी सीमा के एक रेगिस्तानी गांव से दिल्ली के सियासी गलियारों तक का लंबा सफर तय किया.अजमेर के मेयो कॉलेज से पढ़ाई और फिर कच्ची उम्र में ही आर्मी ज्वॉइन करने के बाद जसवंत सिंह ने 1966 में अपनी नाव राजनीति की नदी में उतार ली. कुछ वक्त तक हिचकोले खाने के बाद इस नाव को सहारा मिला भैरों सिंह शेखावत रूपी पतवार का. इसके बाद 1980 में वे पहली बार राज्यसभा के लिए चुने गए.जसवंत सिंह को अटल बिहारी वाजपेयी का हनुमान कहा जाता रहा है. एनडीए के कार्यकाल में वे अटल जी के लिए एक संकटमोचक की तरह रहे. 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद जब भारत आर्थिक प्रतिबंधों की आंधी में फंसा था तब दुनिया को जवाब देने के लिए वाजपेयी ने उन्हें ही आगे किया था. जसवंत सिंह जिन्ना पर लिखी अपनी किताब को लेकर भारतीय जनता पार्टी से निष्कासित किए गये थे. वे अपनी किताब ‘जिन्ना: इंडिया-पार्टीशन, इंडिपेंडेंस’ में एक तरीके से जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष होने का सर्टिफिकेट देते नजर आए थे. अपनी किताब में उन्होंने सरदार पटेल और पंडित नेहरू को देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया था. लेकिन ये बातें भाजपा और आरएसएस की सोच से मेल नहीं खाती थीं. वर्ष 2009 में उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया. जसवंत सिंह की विद्वता, अंग्रेजों से भी अच्छी अंग्रेजी और सोच-समझ कर बोलने के अंदाज के कारण वे हमेशा अपने समय के बाकी नेताओं से अलग दिखाई देते रहे. घुड़सवारी, संगीत, किताबों और अपनी संस्कृति से उन्हें बेहद लगाव रहा. खुद को लिबरल डेमोक्रेट कहने वाले जसवंत सिंह हमेशा विवादों से घिरे रहे लेकिन उनपर कोई भ्रष्टाचार का आरोप कभी नहीं लगा. पिछले लोकसभा चुनाव के कुछ दिन बाद वे अपने घर के बाथरूम में गिर गए और तभी से लगातार कोमा में हैं. भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच शांति का उनका सपना भी अभी अधूरा ही है. इसे लेकर कभी उन्होंने कहा था - भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश एक ही मां की सिजेरियन प्रसव से पैदा हुई संतानें हैं.