व्यक्तित्व

हिंदी फिल्मों के अजातशत्रु संगीतकार रवि

Posted by Divyansh Joshi on



अपने दौर के मशहूर संगीतकार रवि ने गायक बनने के लिए कई पापड़ बेले पर क़िस्मत ने उन्हें संगीतकार बना दिया, और ऐसा कि अपना दौर गुज़र जाने के बाद भी जब मौका मिला, उन्होंने कमाल का संगीत रच दिया. रविशंकर शर्मा गायक बनने आये थे. कई साल धक्के खाने के बाद वे हेमंत कुमार के सहायक बनने में कामयाब हुए. फ़िल्म ‘जागृति’(1954) का गीत ‘हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के’ का संगीत रवि ने ही दिया था पर क्रेडिट हेमंत कुमार को मिला. कहा जाता है कि फ़िल्म नागिन के गीत ‘मेरा मन डोले, मेरा तन डोले’ में रवि ने बीन बजाई थी. लेकिन असल में यह बीन नहीं, क्लेवायलिन था। समय ने पलटा खाया और प्रोडूसर देवेन्द्र गोयल ने उनका हाथ थाम लिया. उन्हें फ़िल्म ‘वचन’ मिली जो सिल्वर जुबली हुई. उसका गीत ‘चंदा मामा दूर के, पुए पकाएं बूर के’ आज तक गया जाता हैरवि के संगीत की ख़ास बात यह है कि वे फ़िल्म के बैकड्रॉप के हिसाब से संगीत देते थे रवि उन चंद संगीतकारों में से एक हैं जो हर गीत के लिए कई- कई धुनें बनाया करते थे. फ़िल्म ‘गुमराह’ का वह अमर गीत ‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों’ के लिए उन्होंने 31 धुनें बनायी थीं लेकिन फिर धीरे धीरे संगीत का दौर बदला और रवि मुंबई से दूर होते चले गए. उन्होंने मलयालम फ़िल्मों में संगीत दिया. वहां भी सराहे गए. पर एक बार हाशिये पर आ जाने के बाद पलटने की हिम्मत और उम्र में अक्सर सीधा-सीधा रिश्ता होता है. रवि का ज़ेहन तो काम कर रहा था पर जिस्म थक गया था. उन्होंने ज़्यादा कोशिश नहीं की और न ही किसी ने ज़हमत उठाई कि उन्हें मुख्यधारा में लाया जाए. पर यह भी सच है कि रवि का संगीत आज भी लोगों के दिलों से जुदा नहीं है