व्यक्तित्व

भीमसेन जोशी : जिनकी आवाज में पूरा भारत दिखता है

Posted by Divyansh Joshi on



‘मिले सुर मेरा तुम्हारा को’ अपनी आवाज देकर हर देशवासी को एक सूत्र में पिरोने का सुरीला संदेश देने वाले पंडित भीमसेन जोशी का आज जन्मदिन है। ‎4 फ़रवरी 1922 को कर्नाटक राज्य के सीमावर्ती धारवाड़ में जन्मे भीमसेन गुरुराज जोशी किराना घराने के संस्थापक अब्दुल करीम खान से बहुत प्रभावित थे। ख्याल गायकी में महारत के साथ साथ उन्होंने कई रागों के संयोजन से नए रागों की रचना भी की। पंडित जोशी जैसे नगीनों ने ही भारतीय शास्त्रीय संगीत को इतना चमकदार बनाया है कि आज हम इसपर गर्व करते हैं। भीमसेन जोशी का परिचय एक वाक्य में ऐसे भी समेटा जा सकता है कि वे भारत की मिट्टी के मिजाज का मूर्त रूप थे. उनकी बुनियाद भले ही किराना घराने की थी लेकिन, उस बुनियाद के ऊपर उन्होंने जो इमारत बनाई उसके ईंट-गारे में और भी बहुत कुछ था. श्रोताओं को उनके गायन में दूसरे घरानों से लेकर लोक, भक्ति और कर्नाटक संगीत तक तमाम रंगों का मनोहारी मेल सुनाई देता था. भीमसेन जोशी खुद भी कहते थे कि उन्हें जो-जो पसंद आया उन्होंने सुना, सीखा और उसे अपनी धारा में मिलाने की कोशिश की. इसका नतीजा एक ऐसा विराट गायन था जिसमें पूरे भारत की गूंज थी.भीमसेन जोशी के बारे में अक्सर कहा जाता है कि गायन की तरफ उनका झुकाव उस दिन हुआ जब उन्होंने किराना घराने की शुरुआत करने वाले उस्ताद अब्दुल करीम खां का एक रिकॉर्ड सुना. लेकिन एक साक्षात्कार में खुद उनका कहना था कि इसकी वजह उनकी मां थीं जो संध्या की आरती के वक्त अपनी मीठी आवाज में पुरंदरदास के भजन गाया करती थीं.संगीत की तरफ भीमसेन जोशी का झुकाव शुरू हुआ तो फिर इसे रोकना मुश्किल हो गया. वे किसी गुरू के पास जाना चाहते थे. लेकिन उनके शिक्षक पिता का मानना था कि पहले उन्हें कम से कम ग्रेजुएशन कर लेनी चाहिए. बात दोनों तरफ से अड़ी रही और 11 साल तक आते-आते संगीत के प्रति भीमसेन जोशी का जुनून इस हद तक बढ़ गया कि वे घर से भाग गए.इसके बाद उनके छह-सात महीने ट्रेनों में हिंदुस्तान की यात्रा करते हुए बीते. पैसे थे नहीं तो यह घूमना गले के बूते हुआ. टिकट चेकर अगर गाने का शौकीन होता तो जहां तक उसकी ड्यूटी होती वहां तक का उनका सफर मुफ्त में हो जाता. संगीत साधना में भीमसेन जोशी जितने गंभीर दिखते थे व्यवहार में उतने ही विनोदप्रिय थे. श्रोताओं ने उन्हें सिर माथे पर बिठाया. देश ने भी उन्हें कई सम्मान दिए. इनमें 2008 में मिला सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न शामिल है. लंबी अस्वस्थता के बाद 24 जनवरी 2011 को 88 साल की उम्र में उनका देहावसान हो गया लेकिन, जिन सुरों को अविनाशी कहा जाता है उनके जरिये भीमसेन जोशी संगीत प्रेमियों के दिलों में हमेशा रहेंगे.