प्राइम टाइम

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Posted by Divyansh Joshi on



देश के ग्रामीण इलाकों में काम कर रहे लोगों की मजदूरी पिछले साल दिसंबर महीने में सालाना 3.8 फीसदी की दर से बढ़ी जो कि पिछले चार सालों की तुलना में सबसे कम है. वहीं इस दौरान खाद्यान्न सामग्री के लिए सालाना थोक महंगाई दर -0.07 फीसदी और गैर खाद्यान्न सामग्री के लिए यह दर 4.45 फीसदी रही.25 कृषि और गैर कृषि व्यवसायों के लिए औसत पर आधारित राष्ट्रीय दैनिक ग्रामीण मजदूरी दर दिसंबर 2018 में 322.62 रुपये रही जो पिछले साल के समान महीने में 310.69 रुपये के मुकाबले 3.84 फीसदी अधिक है.इस तरह से वार्षिक ग्रामीण उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) महंगाई का केवल 1.5 फीसदी है, जिसका मतलब है कि वास्तव में मजदूरी केवल 2.3 प्रतिशत की दर से बढ़ी है.यूपीए सरकार की तुलना में बीते पांच वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी दर में वृद्धि बहुत कम रही है और यह सिर्फ कृषि क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है. दूसरे शब्दों में कहें तो पिछले पांच सालों में महंगाई पर नियंत्रण पाए जाने के बावजूद ग्रामीण मजदूरी में कमी देखी गई है जो कि यूपीए कार्यकाल की तुलना कहीं अधिक कम है.श्रम ब्यूरो की ओर से जारी आंकड़ों से पता चलता है कि दिसंबर में मुख्य कृषि से जुड़े सिर्फ आठ व्यवसायों जुताई, बुवाई, कटाई, उठाई, बागवानी श्रम, पशुपालन, सिंचाई और पौध संरक्षण में औसत वृद्धि दर 5.14 फीसदी रही, जो सामान्य मजदूरी से 4.68 फीसदी से अधिक है.यहां तक कि किसानों को भी अपने उत्पाद और उपज की बहुत कम कीमत मिलती है, कृषि मजदूरी में भी उतनी वृद्धि नहीं हुई है.दूसरी तरफ बीते पांच सालों में से तीन सालों में कुल ग्रामीण मजदूरी दर की तुलना में दिसंबर में सालाना आधार पर कौशल कामगारों जैसे बढ़ई, लोहार, मिस्त्री, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन और हल्के मोटर वाहनों/ट्रैक्टर चालकों की मजदूरी में वृद्धि काफी कम रही है.