प्राइम टाइम

प्राइम टाईम

Posted by khalid on



नीचे देखते हुए भ्रम की स्थिति में कुछ हिचक के साथ राहुल गांधी के भाषण देने का दौर बीत गया। अब राहुल गांधी पूरे जोश में, आत्मविश्वास से परिपूर्ण और तथ्यों के साथ भाषण देते हैं। राहुल गांधी के भाषणों में एक नई धार देखने को मिल रही है।उनके विश्वास में नयापन दिख रहा है, उस हताश प्रयास से कहीं दूर जब 2013 में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान राहुल गांधी ने क़ानून और न्याय के अंतर्निहित मुद्दों की समझ के बिना दिल्ली के प्रेस क्लब में अचानक पहुंच कर उस अध्यादेश को ही फाड़ दिया था जो कि दागी सांसदों, विधायकों और जनप्रतिनिधियों को बचाने वाला था।राहुल गांधी के इस नए विश्वास की कई वजहें हैं। पहली और सबसे महत्वपूर्ण तो ये कि उन्हें विधानसभा चुनावों में जीत मिली है। जिसमें किसी भी मापदंड से छत्तीसगढ़ में मिली कांग्रेस की आश्चर्यजनक जीत भी शामिल हैं। इसकी तुलना पार्टी के उन पिछले प्रदर्शनों से करें, जब पार्टी के पास वहां कहीं अधिक मजबूत नेतृत्व था।पार्टी ने लोगों के बीच जाकर उनकी परेशानियों को समझा और वर्तमान विधानसभा में जीत के लिए अपने चुनावी घोषणापत्र में उनके विचारों को शामिल किया। इसी प्रकार, राहुल गांधी ने अर्थव्यवस्था पर कांग्रेस के विचारों को साफ़-साफ़ रखा है. रफ़ाल फाइटर प्लेन की ख़रीद में, कांग्रेस ने मुद्दा उठाया है कि स्टॉक मार्केट में लिस्टेड पब्लिक सेक्टर की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को दरकिनार कर विदेशी कंपनी को साझेदार बनाने के लिए दबाव डाला गया, उस निजी भारतीय कंपनी को जिसे रक्षा उत्पादन का कोई पिछला अनुभव नहीं था.एक निश्चित आय सीमा से नीचे के लोगों के लिए केंद्र से न्यूनतम आय की गारंटी देने का उनका प्रस्ताव निस्संदेह एक मास्टर स्ट्रोक था- इसने केंद्र को तुरंत ही कुछ उपाय करने पर मजबूर कर दिया.दूसरा यह कि राहुल गांधी के पास पार्टी के उपाध्यक्ष के रूप में इतना वक्त था कि उन्होंने अपने दल का पूरा आकलन करते हुए यह तय करें कि किसे कौन सा काम सौंपना है। उन्होंने अपनी बहन प्रियंका को उत्तर प्रदेश के एक छोटे से टुकड़े के प्रभारी के तौर पर पार्टी का महासचिव बनने के लिए आमंत्रित किया, लेकिन यह फ़ैसला तब किया जब वहां सपा और बसपा के बीच गठबंधन के ऐलान हो गया और उनके पास चुनाव में अकेले उतरने का ही विकल्प बचा था.राहुल ने पार्टी के भीतर भी असुरक्षा की भावनाओं को दूर करने की कोशिश की है लेकिन राजस्थान और मध्य प्रदेश में युवा नेताओं के बहुत दबाव के बावजूद पार्टी के पुराने कार्यकर्ता अशोक गहलोत और कमलनाथ के अनुभव को तरजीह दी गई। कांग्रेस सत्ता में आती है या नहीं, आगामी लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष के बीच कहीं अधिक बराबरी का मुक़ाबला दिखने की संभावना है. लोकसभा चुनाव 2019 में यही होगा।