प्राइम टाइम

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Posted by khalid on



आज के इस प्राइम टाइम में हम राजनीति की बात नहीं करेंगे, बल्कि हम आज बात करेंगे सरकार की । मौजूदा सरकार के किए गए खर्चे के बाद के राजकोषीय घाटे की। कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट्स हर साल देश की सरकार के राजकोषीय खर्चों और आमदनी के आंकड़े जारी करता है । इस बार भी की। इस बार जो आंकड़े निकल के सामने आए, उसके अनुसार अप्रैल 2018 से फरवरी 2019 के दौरान राजकोषीय घाटा 8लाख 51हजार करोड़ रुपये रहा है जो पूरे साल के लिए संशोधित बजट अनुमान से 134 फीसदी ज्यादा है। शुक्रवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार मुख्य रूप से राजस्व संग्रह की वृद्धि कम रहने से राजकोषीय घाटा बढ़ा है। हालांकि, आर्थिक मामलों के सचिव एस सी गर्ग ने कहा कि सरकार राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.4 प्रतिशत पर सीमित रखने को लेकर प्रतिबद्ध है। इस बीच वित्त मंत्रालय ने बयान में कहा कि फरवरी तक केंद्र सरकार ने राज्यों को कर में उनके हिस्से के तहत 5 लाख 96 हजार करोड़ रुपये स्थानांतरित किए. यह 2017-18 की समान अवधि से 67,043 करोड़ रुपये अधिक है, लेकिन इसके बावजूद भी राजकोषीय घाटा बढ़ गया। आंकड़ों के अनुसार केंद्र सरकार की राजस्व प्राप्तियां 12.65 लाख करोड़ रही जो संशोधित बजट अनुमान का 73.2 प्रतिशत हैं. इससे पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में राजस्व प्राप्तियां बजट अनुमान का 78.2 प्रतिशत थीं. सरकार का कर राजस्व 10.94 लाख करोड़ रुपये और गैर कर राजस्व 1.7 लाख करोड़ रुपये रहा.
आईये आज हम सरल भाषा में जानते है कि असल में यह राजकोषीय घाटा क्या होता है।
सरकार की कुल आय और व्यय में अंतर को राजकोषीय घाटा कहा जाता है। इसे अंग्रेजी में फिसकल डेफिसिट भी कहते है। इससे पता चलता है कि सरकार को कामकाज चलाने के लिए कितनी उधारी की जरूरत होगी। कुल राजस्व का हिसाब-किताब लगाने में उधारी को शामिल नहीं किया जाता है। राजकोषीय घाटा आमतौर पर राजस्व में कमी या पूंजीगत व्यय में अत्यधिक वृद्धि के कारण होता है। पूंजीगत व्यय लंबे समय तक इस्तेमाल में आने वाली संपत्तियों जैसे-फैक्टरी, इमारतों के निर्माण और अन्य विकास कार्यों पर होता है। राजकोषीय घाटे की भरपाई आमतौर पर रिजर्व बैंक से उधार लेकर की जाती है या इसके लिए छोटी और लंबी अवधि के बॉन्ड के जरिए पूंजी बाजार से फंड जुटाया जाता है।हमारी अर्थव्यवस्था में राजकोषीय घाटा एक स्थायी तत्व है क्योंकि यहां हमेशा सरकार की आमदनी, उसके खर्चे से कम होती है. हम इसे जीडीपी या ‘सकल घरेलू उत्पाद’ के प्रतिशत के रूप में मापते हैं. पिछले कई सालों से यह घाटा साल-दर-साल कम होता रहा है। इस घाटे के चलते देश को काफी अर्थिक नुकसान हो सकता है इसलिए सरकार और वित्त विभाग को इसके लिए चुन के रणनीति बनानी चाहिए या फिर अपनी रणनीति में परिवर्तन करने चाहिए। बहरहाल कुछ हो न हो लेकिन लोकसभा चुनाव में इसका असर शायद मौजूदा सरकार के लिए थोड़ा सा नुकसान देह हो सकता है।