प्राइम टाइम

प्राइम टाइम

Posted by Divyansh Joshi on



आरबीआई के बोर्ड आफ डायरेक्टर ने देश की आर्थिक वृद्धि पर नोटबंदी का अल्पकालीन नकारात्मक प्रभाव पड़ने को लेकर आगाह किया था और कहा था कि इस अप्रत्याशित कदम का काले धन की समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस प्रभाव नहीं पड़ेगा.बोर्ड आफ डायरेक्टर में आरबीआई के मौजूदा गवर्नर शक्तिकांत दास भी शामिल थे.यह जानकारी एक आरटीआई के तहत सामने आई है। उसके अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा को लेकर राष्ट्र को संबोधन से केवल ढाई घंटे पहले आरबीआई निदेशक मंडल की बैठक हुई। आरबीआई की बोर्ड मीटिंग में कुछ डायरेक्टरों ने इस दौरान कहा था कि श्ज्यादातर काला धन नोटों के रूप में नहीं, बल्कि सोना, जमीन, मकान, दुकान जैसे रीयल एस्टेट के रूप में रखे जाते हैं और इस नोटबंदी के कदम से उन संपत्तियों पर कोई भौतिक असर नहीं होगा।श् कुछ आरबीआई डायरेक्टर्स ने सरकार के इस विचार पर असहमति प्रकट की कि बड़े नोटों की संख्या में वृद्धि की रफ्तार आर्थिक विस्तार की गति के मुकाबले कहीं ज्यादा है। इन डायरेक्टर्स ने कहा कि अगर महंगाई को ध्यान में रखें तो यह वृद्धि का यह फासला बहुत बड़ा नहीं है। उन्होंने कहा था, श्जाली नोटों का छोटी सी संख्या भी चिंता का विषय है, लेकिन सर्कुलेशन में मौजूद नोटों के प्रतिशत के रूप में 400 करोड़ रुपये का आंकड़ा बहुत ज्यादा नहीं है।श् हालांकि, इन डायरेक्टरों ने सरकार के इस बात का समर्थन किया कि नोटबंदी से श्बड़ा सार्वजनिक हितश् सधेगा क्योंकि इससे फाइनैंशल इन्क्लूजन (वित्तीय समावेशन) और डिजिटल पेमेंट्स को बहुत तेज गति मिलेगी। गौरतलब है कि इन विचारों पर सरकार और आरबीआई के बीच छह महीने से चर्चा चल रही थी। सरकार के कुछ विचारों से असहमत होने के बावजूद आरबीआई बोर्ड ने नोटबंदी के प्रस्ताव को हरी झंडी दी। यह प्रस्ताव आरबीआई के डप्युटी गवर्नर ने लाया था, जिसका अनुमोदन वित्त मंत्रालय के एक नोट के जरिए किया गया था। इस नोट में 500 और 1,000 रुपये के नोटों की निकासी की एक ड्राफ्ट स्कीम का उल्लेख था। बोर्ड ने सरकार और आरबीआई ने विभिन्न विचारों पर छह महीने तक चर्चा सुनिश्चित की थी।