प्राइम टाइम

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Posted by Divyansh Joshi on



नेल्सन मंडेला ने कहा है कि अगर आप किसी व्यक्ति से उस भाषा में बात करते है जो वह समझता है तो वह बात उसके दिल में जाती है और इसी भाषा को लेकर अब देश में एक बार फिर विवाद शुरु हो गया है । देश में नई शिक्षा नीति के मसौदे को लेकर विवाद हो गया है. इस मसौदे में क्लास 8 तक हिंदी अनिवार्य किए जाने की सिफारिश की गई है. जिसके बाद दक्षिण भारत की राजनीति मेंहिंदी को लेकर विरोध का माहौल तेज हो रहा है। तमिलनाडु में हिंदी विरोध शुरू हो गया है और सोशल मीडिया पर भी इसका असर दिखने लगा है। केंद्र सरकार की तरफ से इस पर सफाई देने के लिए दक्षिण भारत से ताल्लुक रखने वाले मंत्री सामने आए। दक्षिण भारत के राज्य से ताल्लुक रखने वाले उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी स्पष्ट किया कि सरकार का उद्देश्य हिंदी जबरन थोपने का नहीं है। सारे विवाद की जड़ नई शिक्षा नीति का मसौदा है जिसमें 3 भाषाएं पढ़ाने की बात हो रही है। इस मसौदे में जिसमें हिंदी भी शामिल है और इसी बात को लेकर दक्षिण में विरोध शुरू हो गया है। नई शिक्षा नीति के विरोध को देखते हुए सरकार की तरफ से दक्षिण भारतीय नेताओं ने कमान संभाली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ट्वीट कर सरकार की मंशा स्पष्ट की। विदेश मंत्री जयशंकर ने स्पष्ट किया कि यह सिर्फ मसौदा भर है और लागू करने से पहले इसके सभी पहलू पर विस्तार से विचार किया जाएगा। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार का इरादा क्षेत्रीय भाषाओं को क्षति पहुंचाने का नहीं है। नई शिक्षा नीति 2019 के मसौदे में शुरुआती शिक्षा से ही 3 भाषाएं पढ़ाने का प्रस्ताव है। 3 भाषा के पक्ष में प्रमुख तर्क है कि इससे शुरुआती जीवन से ही बच्चों को बहुभाषी बनने में मदद मिलेगी। मसौदे के अनुसार गैर हिंदी भाषी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा, अंग्रेजी के साथ हिंदी पढ़ाने की सिफारिश की गई है। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी और अंग्रेजी के साथ कोई तीसरी आधुनिक भारतीय भाषा को पढ़ाने की सिफारिश की गई है। हालांकि, आधुनिक भारतीय भाषा की परिभाषा को मसौदे में स्पष्ट नहीं किया गया है। शिक्षा का क्षेत्र समवर्ती सूची में है और इस पर केंद्र और राज्य सरकार दोनों को नियम बनाने का अधिकार है। हालांकि, 3 भाषाओं के इस फॉर्म्युले का विरोध दक्षिण के राज्यों में हो रहा है। 3 भाषाओं के इस फॉर्म्युले को तमिलनाडु के नेताओं ने सिरे से नकार दिया है और इसे लागू नहीं करने का भी ऐलान कर दिया है। गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी अनिवार्य करने संबंधी प्रस्ताव का सोशल मीडिया पर भी विरोध हो रहा है। ट्विटर के आज के ट्रेंड में हिंदी इज नोट द नेशनल लेंग्वेज ट्रेंड कर रहा है। अब इस विवाद के बाद केंद्र सरकार ने कदम पीछे खींच लिए हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने नेशनल एजुकेशन पॉलिसी ड्राफ्ट पर कहा है कि छात्र जो भाषा चाहें, पढ़ने के लिए आजाद हैं। किसी भी भाषा को जरूरी नहीं बनाया जाएगा। छात्र तीन भाषाओं में अपनी मर्जी से भाषा चुन सकेंगे। इसमें हिन्दी भाषा की अनिवार्यता नहीं होगी। जो छात्र तीन भाषाओं में कोई दो भाषा चुनना चाहते हैं वो छठीं या सातवीं कक्षा में चुन सकते हैं।